उत्तराखंड, भारत
शाम का वक्त
यमुना नदी के तट पर बैठी एक लड़की शाम के ढलते नज़ारों को निहार रही थी। वह लड़की काफी खूबसूरत थी, उसका दिल मानो किसी छोटे बच्चे की तरह एकदम पवित्र हो। लड़की की उम्र लगभग 19 साल की थी। शाम की लालिमा में उसका दूध जैसा बेदाग गोरा रंग और भी निखर रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी भूरी आँखें, सुर्ख गुलाबी होंठ और लंबे काले खूबसूरत बाल, जो हवा के झोंके से उसके चेहरे पर बार-बार आ रहे थे।
उसने पीच (Peach) रंग का सलवार सूट पहन रखा था। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था, वह इतनी सादगी में भी किसी का भी ध्यान अपनी तरफ खींच सकती थी। यह लड़की है आन्या। वह एक मिडिल क्लास फैमिली (मध्यमवर्गीय परिवार) से ताल्लुक रखती थी। उसके परिवार में उसके चाचा (राजवीर सिंघानिया) और चाची (मीरा सिंघानिया) रहते थे। बचपन में ही उसके माता-पिता इस दुनिया को छोड़ कर चले गए थे।
पुणे 💕
वही दूसरी तरफ, एक सूनसान सड़क पर तेज़ रफ़्तार से एक कार जा रही थी। वह कार घने जंगल के बीचो-बीच एक खंडहर हवेली के पास आकर रुकी। हवेली के अंदर पूरा अंधेरा था, बस रोशनी थी तो दो खंभों से बंधे एक इंसान के आसपास। वह खून से लथपथ था और उसके चेहरे पर खौफ था।
तभी विहान रोशनी के सामने आया। उसकी हाइट (लंबाई) लगभग 6'2 फीट थी। उसके घने काले बाल और गहरी हल्की नीली आँखें किसी को भी पहली नज़र में अपनी तरफ खींच लेती थीं। उसका जॉलाइन (Jawline) शार्प था और चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान (Devil Smile) थी। उसने फिटिंग वाली सफेद शर्ट पहन रखी थी, जिससे उसकी सिक्स-पैक बॉडी साफ पता चल रही थी। शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे, साथ ही ब्लैक पैंट में उसकी पर्सनालिटी और भी पावरफुल लग रही थी। कलाई पर लिमिटेड एडिशन ब्लैक वॉच (घड़ी) और उंगली में एक साधारण रेड स्टोन (लाल नग) की अंगूठी उसके रॉयल अंदाज़ को दिखाती थी। उसका स्किन टोन फेयर (गोरा) था और एक हाथ जेब में था। वह काफी हॉट लग रहा था, लेकिन इस लुक में अगर कोई उसे करीब से देखता तो डर जाता।
अर्जुन (विहान का राइट हैंड/खास आदमी): "बॉस, इसे और मारना है?"
विहान बोला: "नहीं, आगे मैं देख लूूँगा। तुम लोग निकलो।"
फिर सब चले जाते हैं।
विहान: "तो अशोक खुराना, तुम मेरे परिवार और मेरे बिजनेस को बर्बाद करना चाहोगे?"
जैसे-जैसे अशोक के कानों में विहान की आवाज़ आ रही थी, उसके चेहरे का डर बढ़ता ही जा रहा था।
अशोक ने कहा: "प्लीज़ विहान, मुझे छोड़ दो! तुम जैसे बोलोगे मैं वैसा करूँगा, प्लीज..."
विहान: "ऐसे कैसे छोड़ दूँ अशोक, सज़ा तो मिलनी चाहिए ना? चलो ठीक है, छोड़ देता हूँ।"
जैसे ही विहान जाने के लिए मुड़ा, अशोक पागलों की तरह हंसने लगा, "मुझे पता था विहान तुम मुझे छोड़ दोगे, हा हा हा..."
तभी हवेली में गोली की आवाज़ गूंजी। विहान के हाव-भाव एकदम डार्क (क्रूर) थे और चेहरे पर शैतानी मुस्कान थी। खंभे से लटका हुआ वह अशोक पूरा खून से सन चुका था—विहान ने अशोक को गोली मार दी थी और वह अपने घर के लिए निकल गया था।
सुबह हो चुकी थी। मीरा ब्रेकफास्ट (नाश्ता) बना रही थी, तभी राजवीर आया और बोला, "आन्या अभी तक नहीं उठी क्या?"
मीरा: "पता नहीं राजवीर, मैं आपका लंच पैक कर देती हूँ नहीं तो ऑफिस के लिए लेट हो जाओगे, फिर उसे उठा दूँगी।"
राजवीर अखबार पढ़ रहा था। मीरा जब आन्या के कमरे में जाती है, तो देखती है कि लाइट्स बंद थीं और कमरे से सिसकने की आवाज़ आ रही थी। मीरा डर गई, उसने जल्दी से लाइट्स ऑन कीं और देखा कि आन्या रो रही है। उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह रात भर सोई न हो। मीरा जल्दी से आन्या के पास जाती है और उसे अपने सीने से लगाकर पूछती है, "क्या हुआ आन्या? क्यों रो रही हो?"
आन्या (सिसकती हुई आवाज़ में): "चाची... माँ-बाबा की बहुत याद आ रही है।" (और वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी)।
राजवीर ने रोने की आवाज़ सुनी तो वह ऊपर की तरफ आने लगा और देखा कि आन्या रो रही थी।
राजवीर: "क्या हुआ? तुमने डांटा क्या मेरी बच्ची को?"
मीरा ने गुस्से से राजवीर की तरफ देखते हुए कहा: "मज़ाक का समय नहीं है राजवीर, आन्या को भैया और दीदी की याद आ रही है।"
मीरा भी रोने लगी और आन्या को चुप कराते हुए कहा, "बेटा, मेरी भी बच्ची तुम ही हो ना? तुम क्या मुझे अपनी माँ नहीं मानती हो?"
आन्या: "नहीं चाची, ऐसा नहीं है।"
मीरा: "तो फिर क्यों रो रही हो बेटा? मत रोओ, जाकर फ्रेश हो जाओ।"
आन्या भी सर हिलाते हुए बोली, "ठीक है।" फिर वह बाथरूम में चली गई।
राजवीर ने कहा: "मीरा, तुम क्यों रो रही हो?"
मीरा रोते हुए: "मेरा भी कोई बच्चा नहीं है, पता नहीं मेरे प्यार में क्या कमी रह जाती है जो आन्या को भैया और दीदी की याद आ जाती है।"
राजवीर ने कहा: "ऐसा नहीं है मीरा, कभी-कभी उसे भी अपने माँ-बाबा की याद आ जाती है। तुम आन्या को और प्यार करो, और उसे कुछ दिनों के लिए बाहर भेज दो।"
मीरा बोली: "ऐसे कैसे भेज दूँ आन्या को? आप जानते हो ना हमारी आन्या एकदम बच्ची की तरह है, अभी उसे दुनिया के बारे में समझ नहीं है।"
राजवीर: "अरे! मैं कौन सा बोल रहा हूँ कि अकेले भेज दो। तुम और आन्या पुणे चले जाओ। तुम अपनी बहन से भी मिल लेना और आन्या मायरा के साथ थोड़ा टाइम स्पेंड (वक्त गुज़ार) कर लेगी। उसका भी मन बहल जाएगा, नई जगह और नया माहौल रहेगा।"
मीरा: "ठीक है, आप टिकट बुक कर दो, शाम में ही मैं निकल जाऊँगी। और आप अपना ख्याल रखना।"
अब तीनों ब्रेकफास्ट करते हैं और राजवीर ने आन्या के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "बेटा, तुम और तुम्हारी चाची आज शाम पुणे जा रहे हो, मायरा के घर।"
आन्या ने उछलते हुए कहा: "वाओ! मैं मायरा दी के घर जा रही हूँ, वाओ! थैंक यू चाचू ❤️।"
मल्होत्रा विला...
मैंडिसन (महल) बहुत ही बड़ा था, किसी महल की तरह। बड़े से हॉल में पूरा परिवार इकट्ठा बैठा हुआ था। घर की बड़ी दादी माँ आराम से सोफे पर अपने दोनों बेटों—बड़े बेटे (अभिमन्यु मल्होत्रा) और छोटे बेटे (रुद्रांश मल्होत्रा) से बात कर रही थीं। उनकी दोनों बहुएं—बड़ी बहू (इशिता मल्होत्रा) और छोटी बहू (काव्या मल्होत्रा) सबके लिए चाय-नाश्ता लेकर आती हैं।
बड़ी माँ: "अभी तक विहान उठा नहीं है क्या?"
काव्या: "तुम जानते हो ना ऋषभ अपने भाई को।" (ऋषभ, इशिता मल्होत्रा और अभिमन्यु मल्होत्रा का बेटा था)।
ऋषभ: "ठीक है छोटी माँ, मैं आता हूँ उसे बुलाकर।"
जैसे ही वह सोफे से उठा, तभी सीढ़ियों से उतरते हुए विहान ने कहा, "भाई, आप कहाँ जा रहे हो? मैं आ गया हूँ।"
सबकी नज़र उसकी तरफ हो गई। तभी काव्या ने उसका कान खींचते हुए कहा, "रात भर कहाँ था तू?"
विहान एकदम इनोसेंट (मासूम) लग रहा था, जैसे मानो दुनिया भर की मासूमियत उसी के अंदर हो, लेकिन कोई नहीं जानता था कि उसके अंदर एक शैतान (Devil) छुपा हुआ है।
विहान: "माँ, कल ऑफिस में बहुत काम था। यह ऋषभ भाई आने से मना कर दिए थे, तो सारा काम मैं ही कर रहा था, इसलिए लेट हो गया।"
ऋषभ के चेहरे पर मुस्कान थी और उसने मन ही मन सोचा, 'विहान, मैं तुझको बहुत अच्छे से जानता हूँ। जो नाटक कर रहा है ना तू, लगता है कल फिर किसी को निपटा के आया है।'
इशिता: "हाँ ऋषभ, तू विहान की हेल्प (मदद) नहीं करता है।"
काव्या ने बात को बीच में काटते हुए कहा: "आप इस विहान की बातों में कहाँ फंस रही हैं दीदी, मैं इसको अच्छे से जानती हूँ।"
अभिमन्यु: "काव्या, अब छोड़ भी दो, बड़ा हो गया है तुम्हारा बेटा।"
काव्या ने विहान को छोड़ते हुए कहा, "अगर रात में घर लेट से आना हो तो बता दिया करो विहान, मेरा मन बहुत घबरा जाता है।"
विहान ने काव्या को गले लगाते हुए (Hug करते हुए) कहा: "ठीक है माँ, चिंता मत करो। आपका आशीर्वाद साथ है तो मुझे कैसे कुछ हो सकता है।"
दादी: "सबका हो गया हो तो शादी की तैयारी शुरू करो भाई!"
सब हाँ में सर हिलाते हैं। पूरा परिवार एक साथ ब्रेकफास्ट करके काम पर लग जाता है। विहान और ऋषभ ऑफिस के लिए निकल जाते हैं, और अभिमन्यु व रुद्रांश किसी काम से एक दिन के लिए पुणे से बाहर चले जाते हैं।
शाम का वक्त
आन्या और मीरा पुणे के लिए निकल ही रहे थे, तभी मीरा के फोन पर एक कॉल आया। स्क्रीन पर 'प्रिया' नाम शो (दिखाई) कर रहा था (यह मीरा की बहन थी)।
मीरा (फोन उठाकर): "हेलो! हाँ प्रिया बोलो।"
प्रिया: "अरे दीदी, आप जानती हो ना, मायरा की 6 दिन बाद शादी है!"
मीरा: "ओहो नो! मेरे तो दिमाग से ही निकल गया था प्रिया। आन्या और मैं तेरे घर के लिए ही निकल रहे थे।"
प्रिया: "और जीजा जी नहीं आएंगे क्या?"
मीरा ने कहा: "वह कल आ जाएंगे।"
प्रिया: "ठीक है दीदी, आप लोग आओ, मैं फोन रखती हूँ।"
आन्या और मीरा पुणे के लिए निकल जाते हैं।
इधर, विहान ने ड्राइव करते हुए पूछा, "क्या सोच रहे हो भाई?"
ऋषभ ने कहा: "कल तू कहाँ था विहान?"
विहान: "आप हॉल में नहीं थे क्या भाई? अपनी होने वाली भाभी की यादों में डूबे हुए थे?"
ऋषभ ने थोड़ा गुस्से वाले टोन में कहा: "विहाननन्! अरे यार, अभी मायरा को बीच में मत ला। मैं तुझे अच्छे से जानता हूँ, तूने अशोक खुराना को मार दिया है ना?"
विहान ने एक डेविल स्माइल (शैतानी मुस्कान) के साथ कहा: "वाह भाई! आप तो सब कुछ जानते ही हैं, फिर आप क्यों पूछ रहे हो?"
ऋषभ: "चल ठीक है, जो तूने किया सो किया, लेकिन एक बार भी बताना ज़रूरी नहीं समझा?"
विहान: "भाई, अपनी शादी एन्जॉय करो, मैं यह सब संभाल लूँगा। एक बार शादी खत्म होने दो, फिर आगे से सब बता दूँगा।"
दोनों ऑफिस पहुँच जाते हैं। तभी ऋषभ को मायरा का कॉल आता है।
विहान ने कहा: "कर लो बात, कर लो बात! ये दिन दोबारा नहीं मिलेंगे। मैं अंदर जाता हूँ।"
ऑफिस का नाम 'मल्होत्रा एंटरप्राइजेज' 🥰 था और बाहर से ऑफिस काफी लग्जरी (भव्य) था।
मायरा: "हेलो ऋषभ, तुम कहाँ बिजी थे? मैंने तुमको कितनी बार कॉल किया!"
ऋषभ: "रिलैक्स डार्लिंग, मैं ऑफिस में था।"
मायरा: "अगर आज तुम फ्री हो, तो हमारी शादी से पहले थोड़ी एन्जॉयमेंट हो जाए? रात में क्लब चलें?"
ऋषभ: "हाँ क्यों नहीं 🥰 जान! रात में पिकअप कर लूँगा, ठीक है। बाय मायरा, रात में मिलते हैं, रेडी रहना 😅।"
मायरा: "ओके बाय ऋषभ।"
ऋषभ ऑफिस के अंदर जाता है। वह सीधे बोर्डरूम (Boardroom) पहुँचता है। सभी एम्प्लॉइज़ (कर्मचारी) और मैनेजर पहले से वहाँ मौजूद रहते हैं। सब ऋषभ को देखते ही "गुड मॉर्निंग सर" बोलते हैं। ऋषभ हेड चेयर (मुख्य कुर्सी) के ठीक बगल में बैठ जाता है। तभी मैनेजर पूछता है, "ऋषभ सर, विहान सर कब आएंगे?"
ऋषभ ने स्माइल के साथ कहा, "आते ही होंगे।"
बोर्डरूम में सभी लोग नए प्रोजेक्ट की प्रिपरेशन (तैयारी) में लगे हुए थे, तभी दरवाज़ा खुला और विहान अंदर आया। ब्लैक सूट में उसकी पर्सनालिटी और भी ज्यादा इम्प्रेसिव (आकर्षक) लग रही थी। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह कॉन्फिडेंस (आत्मविश्वास) था और उसकी तीखी नज़रों ने पूरे रूम पर एक नज़र डालते ही माहौल को सीरियस (गंभीर) बना दिया। उसके आते ही सब लोग खड़े हो गए। विहान बिना कुछ कहे अपनी चेयर की तरफ बढ़ा और हेड सीट (मुख्य कुर्सी) पर बैठ गया। पूरा बोर्डरूम उसके बोलने के इंतज़ार में था।
आन्या और मीरा, प्रिया के घर पहुँच गए थे। दोनों फ्रेश होकर आराम कर रहे थे। प्रिया और मायरा दोनों लंच (दोपहर के खाने) की तैयारी कर रही थीं।
2 घंटे बाद:
प्रिया ने मीरा और आन्या को आवाज़ लगाई, "लंच रेडी है, आ जाओ।"
सब डाइनिंग हॉल में आकर बैठ गए। आन्या और मीरा एक-दूसरे से बात कर रही थीं।
ऋषि (प्रिया के पति): "मीरा दीदी, जीजाजी नहीं आए क्या?"
Write a comment ...