तभी अन्या के कमरे का दरवाजा खटखटाया गया। बाहर से आवाज आई।
कबीर: अन्या, दरवाजा खोलो!
विहान अभी भी अन्या को छोड़ नहीं रहा था।
अन्या: प्लीज, बाहर कबीर है!
विहान ने उसे अपनी तरफ घुमाया और बोला: तुम्हें उसकी फिक्र है या मेरी?
अन्या: अभी वह दरवाजे पर है, आप कहीं छिप जाइए ना!
विहान ने मुस्कुराते हुए दीवार पर दोनों हाथ रखे, अन्या का रास्ता रोक दिया और बोला: मैं और छिप जाऊं? इतने बुरे दिन भी नहीं आए मेरे। जाकर दरवाजा खोलो, लेकिन मेरी बात ध्यान में रखना—उससे दूर रहना।
इतना कहकर उसने अन्या को जाने दिया। अन्या कुछ नहीं बोली, दरवाजे के पास गई और पीछे मुड़कर विहान को देखा। विहान ने आंखों से इशारा किया कि दरवाजा खोलो। अन्या ने छोटे बच्चों जैसा मुंह बना लिया, मानो कुछ कहना चाहती हो।
अन्या ने जैसे ही दरवाजा खोला, कबीर तुरंत कमरे के अंदर आ गया। अन्या ने डर के मारे जोर से अपनी आंखें बंद कर लीं और चिल्लाई: नहीं...!
कबीर: क्या नहीं?
अन्या उसकी तरफ मुड़ी और कमरे में चारों तरफ देखा। विहान वहां था ही नहीं, यह देखकर वह थोड़ी शांत हुई।
अन्या: वह... मैंने कुछ देख लिया था, इसलिए।
कबीर: क्या?
अन्या थोड़ा कड़क आवाज में बोलने की कोशिश कर रही थी, जो उससे हो नहीं पा रहा था। फिर भी उसने कोशिश की और बोली: बहुत सवाल-जवाब करते हो तुम! और यहां किस लिए आए हो?
कबीर उसका हाथ छूने ही वाला था कि अन्या बच्चों की तरह बोली: मेरे हाथ गंदे हैं, क्योंकि...
कबीर हंसने लगा और बोला: अन्या, तुम्हें हुआ क्या है?
फिर उसके सिर पर हल्का-सा थप्पड़ मारते हुए कहा: तुम छिपकली की छिपकली ही रहोगी! चलो, सब नीचे तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।
विहान दीवार के पीछे छिपकर उन दोनों की बातें सुन रहा था और कभी अन्या तो कभी कबीर को देख रहा था। विहान का मन कर रहा था कि वह कबीर को अभी इस धरती से मुक्ति दे दे।
अन्या: तुम जाओ, मैं आती हूं।
कबीर उसकी तरफ झुकते हुए बोला: प्लीज यार, इतना इंतजार मत करवाओ। अपने आशिक को इतना तड़पाना अच्छा नहीं होता।
अन्या आसपास विहान को ढूंढ रही थी कि कहीं वह देख न ले। लेकिन उसे क्या पता था कि विहान सब कुछ देख रहा था।
अन्या: ठीक है ना, दे दूंगी जवाब!
उसने हिम्मत करके कबीर को धक्का देकर कमरे से बाहर किया और दरवाजा लॉक कर दिया।
तभी विहान बाहर आया और अन्या के करीब जाकर बोला: क्या बोल रहा था वह?
अन्या: कुछ नहीं, बस वह नीचे आने के लिए...
जैसे ही उसने यह कहा, विहान बीच में ही बोल पड़ा: तुम सच-सच बताती हो या मैं खुद जाकर उससे पूछूं—अपने तरीके से?
अन्या: आप मुझे बार-बार डांटते क्यों हैं? बता तो रही हूं ना! कबीर ने मुझे प्रपोज किया है और वह मुझसे जवाब मांग रहा था।
विहान ने थोड़ा रूखेपन से पूछा: तुम क्या जवाब देने वाली हो?
अन्या ने बड़े प्यार और आत्मविश्वास से कहा: हां बोलूंगी, और क्या!
वह इतने प्यार से कह रही थी जैसे कोई बहुत अच्छी स्पीच दे रही हो।
विहान ने उसकी बांह पकड़ी और बोला: अभी मैंने तुम्हें समझाया था कि तुम उससे दूर रहोगी। अगर तुमने शादी या प्रपोजल के लिए हां किया ना, तो उसी दिन मैं मंडप तैयार करूंगा—हम दोनों के लिए! मैंने सोचा तुम्हें समय दे दूं, लेकिन तुम तो सुनती ही नहीं हो!
अन्या: मुझे दर्द हो रहा है!
विहान: और मेरे दर्द का क्या?
अन्या: कौन सा दर्द?
विहान ने उसे छोड़ा, अपने सिर पर हाथ फेरा और खुद को शांत किया। फिर एक झटके में अन्या के होंठों को अपने होंठों में कैद कर लिया। वह उसे बहुत ही बेकाबू होकर किस करने लगा। अन्या उसकी छाती पर मार रही थी, लेकिन वह उसे छोड़ नहीं रहा था।
10 मिनट बाद विहान ने उसे छोड़ा। अन्या के होंठ सूज गए थे और गाल व नाक सब लाल हो चुके थे।
विहान: यह दर्द... और यह मेरी आखिरी चेतावनी है!
इतना कहकर वह वहां से चला गया। अन्या रोते-रोते फर्श पर बैठ गई।
नीचे संगीत का फंक्शन खत्म हो चुका था। अब शादी की सजावट हो रही थी और सब तैयार होने चले गए थे। ऋषभ, विहान के कमरे में गया। विहान कांच की बड़ी-सी खिड़की के बाहर देख रहा था।
ऋषभ: विहान, तुमने सबके सामने अन्या के साथ अच्छा नहीं किया।
विहान ने बिना पीछे मुड़े कहा: यह मेरी और अन्या की बात है, मैं संभाल लूंगा।
ऋषभ: तुम्हें उससे प्यार तो नहीं हो गया ना? लेकिन एक बात याद रखना, अपने बीते हुए कल की वजह से अपना आज खराब मत करना।
विहान: शायद...
ऋषभ: ठीक है, आगे तुम देख लो। मुझे जो कहना था मैंने कह दिया। बेस्ट ऑफ लक!
6 घंटे बाद
एक तरफ मायरा दुल्हन के जोड़े में तैयार थी। ऋषभ भी अपनी शेरवानी में तैयार था और दोनों मंडप पर बैठे थे। प्रिया की आंखों से आंसू आ रहे थे।
मीरा ने मजाक में कहा: प्रिया, अभी से आंसू? विदाई तक तो रुक जाती!
विहान और कबीर कुर्सियों पर बैठे थे। विहान तिरछी नजरों से कबीर को देख रहा था।
कबीर: क्या हुआ ब्रो, ऐसे क्यों देख रहे हो?
विहान: बस तुम्हें देख रहा हूं। तेरे अंदर कितनी हिम्मत है कि उस रात वाली चेतावनी से तुम्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा।
कबीर ने एटीट्यूड में कहा: अन्या पहले भी मेरी थी और आगे भी मेरी ही रहेगी।
विहान: देखते हैं, आगे तुम्हारा भाग्य कितना साथ देता है।
इतना कहकर विहान वहां से चला जाता है।
अन्या, ऋषभ और मायरा का गठबंधन बांधती है। पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया और फेरे पूरे हुए। इसके बाद ऋषभ ने मायरा के गले में मंगलसूत्र पहनाया और सिंदूर लगाया।
पंडित जी: आज से आप दोनों पति-पत्नी हुए। अब आप दोनों बड़ों से आशीर्वाद ले लीजिए।
मायरा और ऋषभ सभी से आशीर्वाद लेते हैं।
अन्या, ऋषभ के पास जाती है और थोड़े एटीट्यूड से बोलती है: जीजू, दीदी का ध्यान रखना, वरना आपकी खैर नहीं!
ऋषभ ने हंसते हुए अन्या को गले लगाया और बोला: ठीक है, छोटी साली जी!
ऋषि और राजवीर बोले: ठीक है अभिमन्यु जी, अब हमें इजाजत दीजिए। अब रिसॉर्ट से निकलते हैं।
विहान सही मौका देखकर अन्या को अपने साथ दूसरे हिस्से में ले जाता है।
अन्या अपने सिर पर हाथ रखती है और बोली: अब क्या हुआ? आपने तो सब कर ही लिया, अब और कुछ बाकी है?
विहान ने घूरकर अन्या को देखा और बोला: क्या मैंने सब कुछ कर लिया?
अन्या: कमरे में...
विहान ने हाथ फोल्ड किए और कहा: क्या? मैंने क्या किया, अच्छे से समझाओ?
अन्या: देखिए, सब मुझे ढूंढ रहे होंगे। आपकी फैमिली जा चुकी है और जीजू-दीदी भी...
विहान: हां, तो?
अन्या: प्लीज ना!
विहान: मोबाइल नंबर दो।
अन्या: मेरे पास फोन नहीं है, मैं नहीं रखती।
विहान थोड़ा हैरान हुआ और बोला: तुम किस जमाने की हो? फोन नहीं है तुम्हारे पास?
अन्या: नहीं है।
विहान: तुम्हें मैं कल घर से पिक करने आऊंगा, तैयार रहना।
अन्या: लेकिन सब क्या सोचेंगे?
विहान: यह मैं देख लूंगा। बाय!
Milte h cuties 😘 next chapter mein baa byeee💋💋💋
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